पूजा का नैवेद्य…रवीन्द्रनाथ टैगोर की “गीतांजलि” का बंगला से हिंदी में अनुवाद

वे
दिन के ढलते-ढलते
मेरे घर में आये
और बोले,
‘हम यहीं-कहीं तेरे पास
चुपचाप पड़े रहेंगे
देवता की अर्चना में
तेरी सहायता करेंगे
जो प्रसाद…पूजा के उपरान्त मिलेगा
ग्रहण करेंगे’
और इस तरह
दरिद्र-मलिन-वस्त्रधारी
मेरे घर के कोने में चुपचाप
सिमट कर बैठ गये
जब रात प्रबल हुई
मेरे देवालय में घुसकर
अपने मलिन हाथों से
पूजा का नैवेद्य
छींन लिये…

Leave a Reply