फिर…एक बार…रवीन्द्रनाथ टैगोर की “गीतांजलि” का बंगला से हिंदी में अनुवाद

फिर…एक बार
सबने मेरे मन को घेर लिया
फिर…एक बार
मेरी आँखों पर आवरण डाल दिया
मैं फिर…एक बार
इधर-उधर की बातों में उलझ गया
चित्त में आग की लपटें उठने लगीं
मैं फिर…एक बार विक्षिप्त हो गया
फिर…एक बार
तेरे चरण छुट गये…
मुझे डर है…जीवन के कोलाहल में
कहीं तेरा नीरव स्वर न डूब जाये
तू सदा मेरे अंतःकरण में रह…
और अपने अखंड-प्रकाश से
मेरे चित्त को
चिन्मय कर…।

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