जीवन जब नीरस होने लगे…रवीन्द्रनाथ टैगोर की “गीतांजलि” का बंगला से हिंदी में अनुवाद

जीवन
जब नीरस होने लगे
करुणा की धार
बरसाओ
जीवन-माधुर्य जब शेष होने लगे
गीत सुधा-रस
छलकाओ
कर्म…जब दैत्यरूप लेकर
आकाश में गरजने लगे
मेरे हृदय में…हे नीरवनाथ !
अपने शांत चरण
बढ़ाओ
मैं दीन-हीन कृपण
घर के किसी कोने में सिमटा पड़ा हूँ
द्वार खोलकर…हे उदारनाथ !
मेरे राजसमारोह में
पधारो
जब वासनाएं प्रबल होकर
मुझे चारों तरफ से
घेरने लगे…ऐसे में
हे पवित्र…हे चिर-जागृत
रूद्र-वीणा
बजाओ ।

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