तुम्हारे साथ नित्य विरोध…रवीन्द्रनाथ टैगोर की “गीतांजलि” का बंगला से हिंदी में अनुवाद

तुम्हारे साथ नित्य विरोध
अब सहा नहीं जाता
दिन-प्रतिदिन ये ऋण
बढ़ता ही जा रहा है
न जाने कितने लोग
तेरी सभा में आये
तुझे प्रणाम किये…चले गये
मलिन वस्त्र के कारण
मेरा मान नहीं हुआ
चित्त की ये वेदना
कैसे प्रकट करूँ
इसलिये मैं चुप ही रहा
इस बार…हे प्रभु !
मुझे मत लौटाना
मान-अपमान से परे
तेरा चाकर बनकर
मैं चुपचाप पड़ा रहूँ
तेरी चरणों तले
तुम्हारे साथ नित्य विरोध
अब सहा नहीं जाता ।

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