जिस दिन मृत्यु…रवीन्द्रनाथ टैगोर की “गीतांजलि” का बंगला से हिंदी में अनुवाद

जिस दिन
मृत्यु…तेरे द्वार पर आकर
खड़ी हो जायेगी
उस दिन कौन-सा धन दोगे उसे ?
मैं खाली हाथ अपने अतिथि को
विदा नहीं करूँगा
अपने प्राणों के पंक्षी को
उसके सम्मुख कर दूँगा
जिस दिन
मृत्यु…मेरे द्वार पर आकर
खड़ी हो जायेगी
कितने शरत-बसंत की रात
कितनी संध्या, कितने प्रभात
जीवन-पात्र पर
न जाने कितने रस बरसे
कितने फल, कितने फूल खिले
दुःख-सुख के
न जाने कितने आलोक झरे
हृदय में सारे धन को
सँजोकर रखा हूँ
अन्तकाल में
सब कुछ सजाकर उसके
सम्मुख रख दूँगा
जिस दिन
मृत्यु…मेरे द्वार पर आकर
खड़ी हो जायेगी

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