और विलंब न करो…रवीन्द्रनाथ टैगोर की “गीतांजलि” का बंगला से हिंदी में अनुवाद

तोड़ो…तोड़ो…तोड़ो
और विलंब न करो
धूल में गिरकर यहीं
मिट न जाऊँ कहीं
भय है मन में यही
फूल तेरी माला में
गूँथ पायेगा या नहीं
अपने हाथों से मुझे
स्पर्श करो…स्पर्श करो
तोड़ो…तोड़ो…तोड़ो
और विलंब न करो
दिन ढल जायेगा
अँधेरा छा जायेगा
कहीं अनजाने में
ओ रे…निकल न जाये
पूजा की ये बेला
अभी थोड़ा समय है
गंध में अमृत भरा है
रंग फूलों का टटका है
तुम अपनी सेवा में
इसे स्वीकार करो
और विलंब न करो ।

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