क्या तुमने उसकी…रवीन्द्रनाथ टैगोर की “गीतांजलि” का बंगला से हिंदी में अनुवाद

क्या तुमने उसकी
पद्ध्वनि नहीं सुनी
प्रतिदिन-प्रतिपल
वह आ रहा है निरंतर
उसके स्मरण में
मैंने कितने गीत रचे
स्वरलिपि में…’वही’
उदघोषित हो रहा है
वैशाख की खुशबूदार धूप में
वन-प्रदेश से होकर
वह आ रहा है निरंतर
सावन की रात में
बादलों के रथ पर सवार
उमड़ते-घुमड़ते
वह आ रहा है निरंतर
दुःख-पर-दुःख
कदम-दर-कदम
मैं अपने हृदय में
उसकी आहट को
महसूस कर रहा हूँ
उसके पावन-स्पर्श से
आनंदित हो रहा हूँ
यह जानते हुए कि
वह आ रहा है निरंतर ।

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