जितनी पूजा करनी थी …रवीन्द्रनाथ टैगोर की “गीतांजलि” का बंगला से हिंदी में अनुवाद

जीवन में
जितनी पूजा करनी थी
पूरी नहीं हुई
फिर भी…मैं हारा नहीं
कली खिलने से पहले मुरझा गयी
गिर गयी धरा पर
फिर भी…मैं हारा नहीं
नदी की धारा
मरुपथ में…भटक गयी
जीवन में बहुत कुछ पीछे छूट गया
फिर भी…मैं हारा नहीं
मेरा अनागत
मेरा अनाहत
तेरी वीणा के तार में
झंकृत हो रहे हैं
मैं जानता हूँ ।

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