नित नये रूप धर…रवीन्द्रनाथ टैगोर की “गीतांजलि” का बंगला से हिंदी में अनुवाद

नित नये रूप धर
आओ मेरे प्राण में
गंध में…रंग में
आओ मेरे गान में
हे अमृतमय ! आओ
मुग्ध-मुदित-दो नयन में
हे निर्मल-उज्जवल-कान्त
हे सुंदर-स्निग्ध-प्रशांत
आओ नाना-विधान में
नित नये रूप धर
आओ मेरे प्राण में
दुःख में…सुख में
आओ मेरे मर्म में
नित नये कर्म में
सारे कर्मों के अंत में
उतरो…मेरे ध्यान में
नित नये रूप धर
आओ मेरे प्राण में

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