चित्त जहाँ भय शून्य हो…रवीन्द्रनाथ टैगोर की “गीतांजलि” का बंगला से हिंदी में अनुवाद

चित्त जहाँ भय शून्य हो
शीश जहाँ उठे रहे
ज्ञान जहाँ उन्मुक्त हो
गृह-प्राचीर से जहाँ
खंडित न हो वसुंधरा
जहाँ सत्य की गहराई से
शब्द…हृदय से झरे
जहाँ उत्थान के लिये
अनेक हस्त उठे रहे
चारों दिशा में जहाँ
सुकर्म की धारा बहे
अजस्त्र-सहस्त्र प्रवाह में
यह जीवन चरितार्थ हो;
तुच्छ आचरण जहाँ
प्रकृति ग्रहण करे नहीं
जहाँ सदा आनंद हो
हे परमपिता, परमेश्वर
अपने निर्मम आघात से
उस स्वर्ग के प्रदेश में
मेरे भारत देश को
सतत-स्वतंत्र-मंत्र से
झंकार दो…झंकार दो

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