मेघ-पर-मेघ धाय…रवीन्द्रनाथ टैगोर की “गीतांजलि” का बंगला से हिंदी में अनुवाद

मेघ-पर-मेघ धाय
घोर अँधेरा छाये
रखा है क्यों बिठाकर
अकेला मुझे द्वार पर ?
दिन के नाना-कामकाज में
उलझा रहता हूँ मैं
आज बैठा हूँ यहाँ
तेरे ही आश्वासन पर
रखा है क्यों बिठाकर
अकेला मुझे द्वार पर ?
यदि मुँह फेर लिये
तूने दर्शन न दिये
कैसे बीतेगी ओ रे…
ये बेला बरसात की,
आँखें दूर…देख रहीं
केवल तुझे हेर रहीं
हवा के संग-संग
भटके मन व्याकुल होकर
रखा है क्यों बिठाकर
अकेला मुझे द्वार पर ?

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