चैतू की बहुरिया

चैतू की बहुरिया

कूड़े-कचरे के ढेर पर
चुन रही साँवरी…कूक-कोयले
डेग-डेग, ठहर-ठहर
नत फेर नज़र इधर-उधर
ढुलकते पीघल सीकर
नित प्रायः इसी पहर
उठती मन में इक लहर
कि तज दूँ यह शहर…घोर सितम
फिर कोस ज्यों हुई शांत करम
कोई उसे छेड़ उठा, “ऐ छोकरी !
तू फ़ेंक अपनी टोकरी
चल मेरे संग
अरे, घुमा लाऊँ एक पहर
दिखा लाऊँ तुझे शहर”
त्यों फेर चकित-चितवन
झुलसा हुआ झकझोर तन
बोल उठी सहसा, “ए किमि लोग !
दुर…इनका करम कइसा
माई-न-बहिन फिरे बेशरम जइसा”
पुनः छोड़ एक उसांस
हुई वह शांत
और कही सगर्व, “मैं हूँ
चैतू की बहुरिया
दुपहरिया” ।

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