जब से दिल मेरे महबूब से लगा है

जब से दिल मेरे महबूब से लगा है
मैं कैसे कहूँ कि कितना मज़ा है

किताबों में लिखा है, लेकिन मैंने
ढाई अक्षर प्रेम का चखा है

धीरे-धीरे सरकता है, मीरा का प्याला
और कबीरा चौराहे पे खड़ा है

कितना गहरा है महबूब का समंदर
आंकने नमक का पुतला चला है

जिसका मन शिष्य, आत्मा गुरु हो
यक़ीनन, उसी के रू-ब-रू खुदा है

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