फिरंगी पीठ पर सवार न होते

फिरंगी पीठ पर सवार न होते
दंगे-फसाद बार-बार न होते

न होते देश के टुकड़े-टुकड़े
अगर खुदगर्ज़ पहरेदार न होते

समझ लेते गाँधी को अगर
ये खूनी त्योहार न होते

है अभी तलक वही सिलसिला
क्या चाहते तो सुधार न होते

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