मैंने तुम्हें कब, कब नहीं समझा

मैंने तुम्हें कब, कब नहीं समझा
तुम्हीं को अपनी ज़िन्दगी समझा

यही समझाने में उम्र ढल गयी
देर से समझा, मगर सही समझा

मोहब्बत भी क्या बला है, यारों
जिनको हुई, वही समझा

समझाते-समझाते समझ गया
है उधर भी आग लगी समझा

ज़िन्दगी-भर मुझसे रूठे रहे
जब मैं रूठा तो दिल्लगी समझा

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