शरद की साँझ के पंछी

ऊपर फैला है आकाश, भरा तारों से
भार-मुक्त से तिर जाते हैं
पंछी डैने बिना फैलाये ।
जी होता है मैं सहसा गा उठूँ

उमगते स्वर
जो कभी नहीं भीतर से फूटे
कभी नहीं जो मैं ने –
कहीं किसी ने – गाये ।

किन्तु अधूरा है आकाश

हवा के स्वर बन्दी हैं

मैं धरती से बँधा हुआ हूँ –

हूँ ही नहीं, प्रतिध्वनि भर हूँ

जब तक नहीं उमगते तुम स्वर में मेरे प्राण-स्वर
तारों मे स्थिर मेरे तारे,
जब तक नही तुम्हारी लम्बायित परछाहीं
कर जाती आकाश अधूरा पूरा ।
भार-मुक्त
ओ मेरी संज्ञा में तिर जाने वाले पंछी
देख रहा हूँ तुम्हें मुग्ध मैं ।

यह लो :
लाली से में उभर चम्पई
उठा दूज का चाँद कँटीला ।

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