लाचार परिंदों के पर हैं

लाचार परिंदों के पर हैं
धमाके से उनको भी डर है

तुम्हें मालूम हो कि न हो
आँगन में उनके भी घर हैं

गोलियां चलती हों जहाँ भी
हवाओं में घुलता ज़हर है

फूल महके चाहे कहीं भी
हर चमन को उसकी ख़बर है

आदमी, आदमी को न चाहे
ये कैसा अज़ीबो-सफ़र है

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