पत्थरों के घर कभी घर नहीं लगते

पत्थरों के घर कभी घर नहीं लगते
मुस्कान के बिना सरस अधर नहीं लगते

खाली-खाली लगे, घर का कोना-कोना
पत्तों के बिना अच्छे तरूवर नहीं लगते

फ़सल खेत की, जब होती नहीं अच्छी
क्या संकट में हमारे शहर नहीं लगते

रिश्तों में फर्क, पड़ी खेतों में दरार
क्या ये बंटवारे के मंज़र नहीं लगते

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