ज़िन्दगी का कोई फ़लसफ़ा नहीं है

ज़िन्दगी का कोई फ़लसफ़ा नहीं है
कुछ करो या मरो के सिवा नहीं है

कील ठोककर कहीं खूंटी बना लूँ
ऐसी कोई दीवार यहाँ नहीं है

तनहाई में रूह काँप उठती है
कैसे कहूँ कि कोई हवा नहीं है

मरहूम लगे ये जिस्म-ओ-ज़िगर
प्यार दिल में अगर जगा नहीं है

ज़िन्दगी शरमाती है, दुल्हन की तरह
जब-तलक घूँघट उठा नहीं है

Leave a Reply