यहाँ कोई किसी से मिलता नहीं

यहाँ कोई किसी से मिलता नहीं
इस संगे-शहर में गुल खिलता नहीं

शीशा टकराता है, पत्थरों से खुद ही
अपनी जगह से कोई हिलता नहीं

कोई अपना होता इस शहर में अगर
मैं हर्गिज़ मारा-मारा फिरता नहीं

झूठ कहने का अफसोस है लेकिन
क्या करूँ, सच से कोई रिझता नहीं

हम फंसे हैं जिस जज़ीरे में आ के
धुंध इतनी है कि कुछ दिखता नहीं

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