रूह को मिलती नहीं पनाह यारों

रूह को मिलती नहीं पनाह यारों
क्या बाकी है, और भी चाह यारों

फिर उसे पैरहन नसीब होगा
फिर होगा एक बार गुनाह यारों

मर के भी छुटकारा नहीं, रूह को —
मिलती नहीं जब-तक दरगाह यारों

है वही हमारे दरमियाँ मौज़ूद
ना समझ होते है गुमराह यारों

रहे खुदा का डर सबको वर्ना
कौन चलता है सीधी राह यारों

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