क्या खोया और क्या पाया मैंने

क्या खोया और क्या पाया मैंने
ये हिसाब कभी न लगाया मैंने

उनकी खिदमत की, उम्रभर यारों
हर तरह से बहुत रिझाया मैंने

सब आये-गये लेकिन वो न आये
घर था जिनके लिये सजाया मैंने

मेरी एक न चली उनके आगे
सितम जिनके लिये उठाया मैंने

चोट हलकी थी, जख्म गहरा हुआ
वो न आये कभी, न बुलाया मैंने

मैं गुनह्गार हूँ उनकी निगाहों में
जिनको रोशनी में लाया मैंने

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