अँखियाँ हरिदर्शन की प्यासी

मन तेरे चरणों से लिपटा
इंन्द्रियाँ बनीं दासी
अँखियाँ हरिदर्शन की प्यासी

बीत चुका ये जीवन मेरा
जो रहा अति विलासी
अमावस की रात भी देखी
अब देखूँ पूरनमासी
अँखियाँ हरिदर्शन की प्यासी

जिधर देखूँ तू-ही-तू है
अदभुत तेरी झांकी
जिन आँखों से देखूँ मैं वो
आँख है अविनाशी
अँखियाँ हरिदर्शन की प्यासी

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