हरिदर्शन को प्यासी अँखियाँ

गुम-सुम बैठी राधा से आ
पूछे सारी सखियाँ
हरिदर्शन को प्यासी अँखियाँ

बता सखि री, शून्य में तेरी
क्यों खोई हैं अँखियाँ
अभी-अभी क्या नयन-द्वार से
निकल गया है छलिया
हरिदर्शन को प्यासी अँखियाँ

बोल सखि, मन-ही-मन किससे
करती प्रायः बतियाँ
सब कहते हैं, “डूब गई हैं
हरि में जैसे अँखियाँ”
हरिदर्शन को प्यासी अँखियाँ

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