बूँद-बूँद रस बरसे मन में

फिर न जाने क्यों मेरा मन
तड़पे हाय, लगन में
बूँद-बूँद रस बरसे मन में

भूल हुई है क्या मुझसे
कुछ कहो प्रिय, समर्पण में
भटक रहा है मन जोगन का
युग-युग से वन-वन में
बूँद-बूँद रस बरसे मन में

कोई न बताये कब होगा
मिलना मनमोहन में
सब कहते हैं, “तू रखता है
सबको आलिंगन में”,
बूँद-बूँद रस बरसे मन में

Leave a Reply