कहाँ गया तू झलक दिखा के

सुध-बुध मैंने अपनी खोई
सांध्य-दीप जला के
कहाँ गया तू झलक दिखा के

बंद किया सभी द्वार क्षण में
तू हृदय में समा के
बुझा दिया रे जलती लौ को
कर से पवन बहा के
कहाँ गया तू झलक दिखा के

पल-पल ज्योति घटती, गया
तू ऐसा ग्रहण लगा के
सब कहते हैं, “चला गया कनु
चौंसठ-कला दिखा के”,
कहाँ गया तू झलक दिखा के

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