उलझी सब सखियों की डोरी

इसे न कोई सुलझा पाया
सखि, चले न बलजोरी
उलझी सब सखियों की डोरी

ओर-छोर जब कहीं न पायी
सखियाँ पूछी, “ओ री,
तू कैसे पायी कान्हा को
बता, हमें भी गोरी
उलझी सब सखियों की डोरी

पाकर अपने मनमोहन को
भूल न सखियों को री
सब कहतीं, “माधव के रस में
आकर हमें डुबो री”,
उलझी सब सखियों की डोरी

Leave a Reply