अंग-अंग डाली हो जैसे

आ बैठा जानु पर मेरे
कदम्बतरु हो जैसे
अंग-अंग डाली हो जैसे

तू मेरे हृदय में समाया
वंशी लेकर ऐसे
छेड़ी ऐसी तान सुरीली
छूटी अपने ‘मैं’ से
अंग-अंग डाली हो जैसे

पहुंची मानो यमुना-तीरे
मुझको पुकारा जैसे
सब कहते, “कान्हा से लिपटी,
प्रेमलता हो जैसे”,
अंग-अंग डाली हो जैसे

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