देख सके न कोई तड़पना

यादों की मैं चादर ओढ़ी
दर्द लिये सब अपना
देख सके न कोई तड़पना

सच लगे पर कभी तो मानो
लगता जैसे सपना
श्रृंगार गया ले जब से तू
मैं देखूँ दर्पण ना
देख सके न कोई तड़पना

रिश्ते-नाते सब हैं लेकिन
कोई लगे न अपना
सब कहते हैं, “नहीं पराया
एक तू – ही है अपना”,
देख सके न कोई तड़पना

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