जल बीच मीन प्यासी रे

डूब गयी हूँ जल में फिर भी
मैं क्यों हूँ प्यासी रे
जल बीच मीन प्यासी रे

घट-घट में ओ बसनेवाले
बना क्यों प्रवासी रे
कहाँ चला तू तोड़ गगरिया
कैसा अविनाशी रे
जल बीच मीन प्यासी रे

सब कहते हैं – अन्तर्यामी
सुन भोग – विलासी रे
बता कहाँ जाऊँ, हे माधव!
पूछ रही दासी रे
जल बीच मीन प्यासी रे

 

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