मैं लोभी हूँ रामरतन का

आती-जाती साँसें मेरी
सुख भोगे राम के धन का
मैं लोभी हूँ रामरतन का

पाकर जिसको हो जाता है
मानव प्रिय जन-जन का
बढ़ता है जो लोभ करे, वह
धन है राम-भजन का
मैं लोभी हूँ रामरतन का

सदा निहारूँ अपने अंदर ही
ऐसा दो हृदय गगन-सा
कृपा करो, संतोष-धन छीनो
झंकार दो तार मन का
मैं लोभी हूँ रामरतन का

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