सुनी-सुनायी न रटी-रटायी

उस दिन से जाना जब से
श्रीराम ने छीनी लटायी
सुनी-सुनायी न रटी-रटायी

छीन ली क्यों निर्मोही ने
मुझसे मेरी परछाँई
देता है सिर्फ बदले में जो
दुःख की अतल गहराई
सुनी-सुनायी न रटी-रटायी

सांस-सुगंध है जब-तक
कर ले, मस्ती तो है पराई
पतंग-सा वही उड़ाता है
ये बात समझ अब आयी
सुनी-सुनायी न रटी-रटायी

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