जब से रामचरणचित्त लागा

चरण-स्पर्श होते ही मन का
चोर निकल कब भागा
जब से रामचरणचित्त लागा

भक्तिमय सेवा द्वारा श्री
राम को मैंने जाना
सुलझ गया जो उलझ गया था
मेरे मन का धागा
जब से रामचरणचित्त लागा

खुल गये दसों द्वार सहज ही
अब न रहा अभागा
सोया भाग्य रामकृपा से
पलभर में ही जागा
जब से रामचरणचित्त लागा

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