श्रीरामसमर : द्वितीय-खण्ड

श्रीरामसमर : द्वितीय-खण्ड

ढूँढ़ रहे हैं राम-वियोगी । आह, प्राणप्रिया कहाँ होगी ।।1।।
पूछ रहे हैं वन-उपवन से । पता सिया का, प्रभु निज मन से ।।2।।
छायी है मुख पर उदासी । देख हुए चिंतित वनवासी ।।3।।
कहते-फिरते निज राम व्यथा । सब अंतर्मन की अकथ-कथा ।।4।।
करते विलाप वन में भारी । लौकिक मानव-सा अवतारी ।।5।।
जब मैं नहीं था कौन आया । वह साहस कैसे कर पाया ।।6।।
कहो, जड़-चेतन जीवधारी । हाँ, कौन था वह दुराचारी ।।7।।
चुप क्यों हो, हाँ कुछ तो बोलो । क्षणभर ही राम संग हो लो ।।8।।
आज सिया बिन शक्तिहीन हूँ । जगत में सबसे अतिदीन हूँ ।।9।।
कहो, सिया जहाँ हो जाऊँ । पुनः शक्ति प्राणों में पाऊँ ।।10।।

2

खग-मृग सब वन रो पड़ते हैं । सुनकर अक्षि से अश्रु बहते हैं ।।1।।
आज भू पर हाय, मुक्तिदाता । पड़े हैं संकट में विधाता ।।2।।
सीता के अदृश्य हो जाते । राम स्वयं को जान न पाते ।।3।।
पल-पल सोच में डूबे हुए । चलते हैं मानो रुके हुए ।।4।।
सोच रहे क्या भूल हुई है । प्राणप्रिया कहाँ रूठ गई है ।।5।।
शक्तिहीन पुरुष बिन नारी । नर बिन अर्धसत है नारी ।।6।।
रक्षा न कर सका तुम्हारी । शोक मन में इस हेतु भारी ।।7।।
“हे देवी!” राम सदैव बोले । “क्षमा करो”, कहकर मुख खोले ।।8।।
शक्तिहीन हुए दोनों जानु । प्रिये, व्यर्थ धनुष-वाण मानूँ ।।9।।
जब संकेत न कोई पाया । विरह-अग्नि में जलती काया ।।10।।

3

ऋषिवर सहन कर नहीं पाये । शरण में संकोचवश आये ।।1।।
बोले, “हे राम! उठो दाता । जागो विस्मृति से विधाता ।।2।।
किस हेतु आये उसे जानो । पुनः स्वरूप अपने पहचानो ।।3।।
होगा संपन्न राम द्वारा । अजस्त्र बहेगी शक्ति-धारा ।।4।।
भू से दूर करो तम सारा । तोड़ो हाँ, निःसंशय कारा” ।।5।।
सन्देश ऋषि नवयुग का, देते । तरु पंथी को छाया देते ।।6।।
भड़क उठी चिंगारी वन में । देखो, उड़ती चील गगन में ।।7।।
आह! किसने विनाश रचा है । जग में हा-हाकार मचा है ।।8।।
नवयुग आज पुकार रहा है । कहो, हमारा राम कहाँ है ? ।।9।।
मानवता खतरे में जानो । उठो राम, प्रत्यंचा तानो ।।10।।

4

हाय, खोया मैंने प्रिया को । हाँ, हिरण के पीछे सिया को ।।1।।
चतुर्मुखी दुःख ने आ घेरा । उजड़ गया वन में सब मेरा ।।2।।
पर ऋषियों की वाणी सुन के । आदर किये श्रीराम उनके ।।3।।
भूल गये फिर सब दुःख अपने । साकार चले करने सपने ।।4।।
ज्यों दृश्य दृग के निकट आये । उसे विलोक राम मुस्काये ।।5।।
जब समादृत-ऋषि-विचार हुआ । तभी शक्ति का संचार हुआ ।।6।।
राम समर हेतु बढ़े आगे । भाग्य महादानव के जागे ।।7।।
अब सेना तैयार करेंगे । सेतुबंध निर्माण करेंगे ।।8।।
वन में प्रकट हुई ज्यों माया । त्यों उत्साह चतुर्दिक छाया ।।9।।
सांझ हुई जब दिनमान ढले । लक्ष्य की ओर श्रीराम चले ।।10।।

5

देख विवश सब वन के प्राणी । प्रभु-सेवा करने की ठानी ।।1।।
लेकिन सब-के-सब विफल हुए । भगवन क्षणभर को विकल हुए ।।2।।
हाय-हाय कर वन पछताये । हम न कोई काम ही आये ।।3।।
सोच मन में देख विधाता । घोर तम का सिंधु लहराता ।।4।।
पार इसे कैसे कर जाऊँ । हाँ, किस विधि उपाय कर पाऊँ ।।5।।
राम चिंता में डूबे हुए । है मन अछोर में लगे हुए ।।6।।
एक टक वारीश ज्यों देखा । देख प्रभु ने किया अनदेखा ।।7।।
उपाय अनेक उठते मन में । व्यर्थ सभी हो जाते क्षण में ।।8।।
चमकी मानो विद्धुत जैसी । हुई देववाणी कुछ ऐसी ।।9।।
समर में तू अकेला होगा । सेना विहीन लड़ना होगा ।।10।।

6

फिर क्लांत-पथिक-सा सुसताये । निद्रा में विचित्र सपने आये ।।1।।
बंदी बने हुए कारा में । डूबे चिंता की धारा में ।।2।।
भू पर खींच रहे हैं रेखा । भाग्य कहो, किसने है देखा ।।3।।
राम बता रहे इसी द्वारा । सिवाय कर्म न कोई चारा ।।4।।
बंधे नागपाश में ऐसे । जाने प्रभु छूटेंगे कैसे ।।5।।
विधि स्वप्न में ऐसी आयी । राह एक ज्योति दिखलायी ।।6।।
कारा के सप्तद्वार खुले । शक्तिमान हो श्रीराम चले ।।7।।
गुप्तचर विकट रूप बनाये । व्यर्थ राम के पीछे धाये ।।8।।
देखा प्रभु ने भूधर आगे । बढ़ते गये निरंतर आगे ।।9।।
गिरि पर चंडिका को देखा । खिंच गयी आशा की रेखा ।।10।।

7

किये राम दर्शन देवी के । पास पहुंचकर मातादी के ।।1।।
देवी यदि प्रसन्न हो जाये । कौन उसे जग में छू पाये ।।2।।
त्रिशूल ध्यान में ज्यों आया । तत्क्षण राम ने सिर नवाया ।।3।।
देवी प्रसन्न होकर बोली । “आ वत्स”, और पीछे हो ली ।।4।।
बैठे रिक्त स्थान त्यों पा के । अंक में ज्यों, शिशुवत माँ के ।।5।।
शक्ति पाकर राम ज्यों जागे । सपनों के दानव सब भागे ।।6।।
प्रभु चले हृदय में भाव लिये । जगमगा उठे अनंत दिये ।।7।।
हर पंथ ज्योतिर्मय हो गया । क्षणभर को तम कहीं खो गया ।।8।।
सुदूर हुई निराशा जन की । मिटी दाह सब अंतर्मन की ।।9।।
सब जड़-चेतन राम भरोसे । हुए जान सम्पन्न गुणों से ।।10।।

8

संकेत प्रभु स्वप्न में पाकर । लिये संकल्प तट पर आकर ।।1।।
होगी आज शक्ति की पूजा । रावण सिवा न ब्राह्मण दूजा ।।2।।
जान रहा जो स्वयं भाग्य को । तभी ललकार रहा राम को ।।3।।
वह क्रोधवश मुक्ति पायेगा । शत्रु शरण में स्वयं आयेगा ।।4।।
भू पर देवी जाग उठेगी । दानव से ही प्यास बुझेगी ।।5।।
हाँ, जब-जब आरोहण होगा । दानव का अवरोहण होगा ।।6।।
देवी जब अति प्रसन्न होगी । तब मृत्यु दसग्रीव की होगी ।।7।।
छल राम से रावण करेगा । निश्फल होकर स्वयं मरेगा ।।8।।
वध राम के वाण से होगा । रावण लीन राम में होगा ।।9।।
पुनः संग ले राम सिया को । सहर्ष आयेंगे अयोध्या को ।।10।।

9

रावण अपना रूप दिखाया । महाघोर आतंक मचाया ।।1।।
निकट राम को अपने पा के । छोड़ा वाण क्रोध में आ के ।।2।।
तब प्रत्यंचा उठे तान के । छूटे धनु से वाण राम के ।।3।।
होता युद्ध रोमांचकारी । खूब चले शर बारी-बारी ।।4।।
राम-रावण उभय बलशाली । जाये शर न किसी का खाली ।।5।।
हाँ, शक्ति कहाँ से मिलती है । गर्दन कट-कटकर जुड़ती है ।।6।।
हर वाण विफल होते पाया । प्रभु को कुछ भी समझ न आया ।।7।।
देवी शक्ति-संपन्न हो के । क्यों न इस दानव को रोके ।।8।।
विकराल काल-सा मुँह बाया । निगलने श्रीराम को आया ।।9।।
उड़ती धूल गगन में काली । रावण से लड़ती है काली ।।10।।

10

इन्द्र के रथ पर सवार हुए । युद्ध को राम तैयार हुए ।।1।।
रौद्र-रूप निज धर कर आये । रण में अति उत्पात मचाये ।।2।।
आगे बढ़े क्रोध में आ के । सभी दिशायें थर-थर काँपे ।।3।।
आग्नेयास्त्र राम ने फेंका । परास्त उसे न होते देखा ।।4।।
विभीषण के वचन को सुन के । चला वाण मंत्र से छूट के ।।5।।
घूमता हुआ ब्रह्मशर आया । अमृत-कुण्ड नाभि का सुखाया ।।6।।
“राम-राम” गिरते ही बोला । रावण ने अपना मुख खोला ।।7।।
सूर्य समान ज्योति निकल के । समा गयी राम में चमक के ।।8।।
“जय-जय” का घोष लगा होने । लगी पुष्प की वर्षा होने ।।9।।
मुनियों ने की स्तुति राम की । बोलो, “जय-जय सियाराम की” ।।10।।

11

खूब नगर में खुशियाँ छायीं । सब ने राम-ज्योति जलायी ।।1।।
रघुकुल का एक रखवाला । श्रीराम ने राज संभाला ।।2।।
आज न वैसा शासक कोई । कहाँ हमने वह ज्योति खोई ।।3।।
सूर्य यदि हनुमान उगल दे । दानव का सब राज बदल दे ।।4।।
सबको ढाढ़स दिया राम ने । पाकर हनुमान को सामने ।।5।।
बोले, “साथ न चलो हमारे । हम सदा ही ऋणी तुम्हारे ।।6।।
त्यों हनुमान नयन भर बोले । मर्म हृदय के, अश्रु में खोले ।।7।।
चरण शरण बोले मइया को । कपि की पार करो नइया को ।।8।।
सुनकर सिया लगी मुस्काने । स्वाद भला बानर क्या जाने ।।9।।
हनुमान श्रीराममय हो के । लगे नाचने चिन्मय हो के ।।10।।

12

आज्ञा लेकर सिया राम से । निवृत्त हुई इस धरा-धाम से ।।1।।
मन हुआ अति शोक से भारी । विदा हुए सब बारी-बारी ।।2।।
धरा में सिया-शक्ति समायी । हुए नाग की शय्या भाई ।।3।।
सरयू के तट पर जब आये । प्रभु विष्णु-धारा में समाये ।।4।।
अनाथ हुए हाय, नाथ बिना । कभी पात हिले न वात बिना ।।5।।
सुन-सुनकर सब जन पछताये । ढेला समान प्राण विलाये ।।6।।
कण-कण में राम में विष्णु है । सब राममय अणु-परमाणु हैं ।।7।।
जगमाया, माया से जग है । सुस्पन्दित ब्रह्म से रग-रग है ।।8।।
तोड़ो-तोड़ो अज्ञान-कारा । ‘तत्त्वमसि’ गुरुमंत्र के द्वारा ।।9।।
सूत्र द्वार ज्ञान का, खोले । आत्मा ‘अहम ब्रह्मास्मि’ बोले ।।10।।

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