श्रीरामसमर : प्रथम-खण्ड

श्रीरामसमर : प्रथम-खण्ड

उर में भाव लिये अर्पण का । पुष्कर शांत हुआ दर्पण-सा ।।1।।
अनावृत हुई जल में छाया । कल्याण हेतु आयी माया ।।2।।
होगा जो निश्चित है होना । रूप धर मायावी सलोना ।।3।।
सोचती मन-ही-मन पुनीता । स्फटिकशिला पर बैठी सीता ।।4।।
हवा चली वन में मतवाली । सुध खोई हर डाली-डाली ।।5।।
झूम रहीं वृक्षों पर लतायें । उपवन फूलों से गंधाये ।।6।।
झरते प्रसून सम्मोहन में । देख-देखकर छवि पुष्कर में ।।7।।
मयूर उत्सव में नाच रहे । श्रीरामकथा ऋषि बांच रहे ।।8।।
कदाचित रच रही जगदम्बा । ज्यों सृष्टि की लीला अचम्भा ।।9।।
भेद सकल जग जान न पाये । राम बिना सुख प्राण न पाये ।।10।।

2

नृप के तज आभूषण आये । राम सिया संग लखन आये ।।1।।
तन पर कपिश-परिधान मोहे । तूणीर में मुक्ति-वाण सोहे ।।2।।
राम विपिन में विचर रहे हैं । भू के कण-कण सिहर रहे हैं ।।3।।
क्यों न अरण्य भला इतराये । धनुष-वाण लिये राम आये ।।4।।
खग रामाकर्षण से नभ के । नीत लोटते रामचरण के ।।5।।
कमलचिन्ह श्रीरामचरण के । पहुँचाये ऋजु रामशरण में ।।6।।
राम विमुख को अति दुर्लभ है। मुक्ति ‘रामाज्ञा’ से सुलभ है ।।7।।
रामघाट जो प्राणी आये । वही राम के दर्शन पाये ।।8।।
प्रभु ने ऐसे वाण चलाये । टूटी तन्द्रा, प्राण हिलाये ।।9।।
बंद हुआ जब द्वार काम का । प्रकाश मिला अखण्ड राम का ।।10।।

3

तुलसीरज ‘शर्मन’ ज्यों पाया । रामदीप ने पथ दिखलाया ।।1।।
है क्या उपाय भव तरने के । सिवाय रामनाम भजने के ।।2।।
तम के पथ पर चलते-चलते । इस जीवन के ढलते-ढलते ।।3।।
नित चित्त में बस ध्यान कर ले । जीवन को ज्योति से भर ले ।।4।।
रामनाम तुकबंदी प्यारी । एक ज्योति जग में हितकारी ।।5।।
वृन्दावन में प्रभु प्रकट हुए । अंतर दर्शन से स्पष्ट हुए ।।6।।
रामकृष्ण अनुस्यूत ऐसे । हंस सरोवर में हो जैसे ।।7।।
मधुर रची ‘कृष्णगीतावली’ । सुनकर वंशीधर की मुरली ।।8।।
देख सृष्टि में खेल राम का । अवतार सोलह – श्रृंगार का ।।9।।
मिली भगवती सियाराम को । यमुना के तट प्रिया श्याम को ।।10।।

4

शब्द नहीं वर्णन करने को । भाव है समर्पण करने को ।।1।।
जड़-चेतन गतिमान जगत में । श्रीराम बसे हर स्पंदन में ।।2।।
दिन में हुआ अकस्मात् कैसे । प्रतिबिंबित हुआ चाँद जैसे ।।3।।
दिन है याकि रजनी का प्रहार । भ्रम होता है यही सोचकर ।।4।।
यों तो मध्याह्न का समय है । सूर्य गगन में तेजोमय है ।।5।।
पर घने वृक्षों की छाया से । दिवस लगता रात हो जैसे ।।6।।
चन्द्र नहीं, सीता का आनन । जगमगजग करता सब कानन ।।7।।
मुख देख अरण्य में राम का । सुख पाते ऋषि परमधाम का ।।8।।
सौर्यमंडल विपिन को मानो । अखण्ड-ज्योति राम को जानो ।।9।।
जय त्रिलोचन पार्वती-मंगल । जय-जय राम जानकी-मंगल ।।10।।

5

देख सियावर राम प्रिया को । नीरव वन में मैथिलिका को ।।1।।
सोचते राम मन-ही-मन में । नहीं विश्राम कहीं इस वन में ।।2।।
छिपा रखी आँचल में दुःख को । तजकर राजभवन के सुख को ।।3।।
भटक रहा मन वैदेही का । श्रृंगाररहित-तन देवी का ।।4।।
भावुक हुए श्रीराम वन में । लीला हेतु आये भुवन में ।।5।।
त्रिगुणातीत गुणों से पूरित । मायातीत माया से अंकित ।।6।।
रिझाते निज सिया को ऐसे । मानवरूपी प्रभु हों जैसे ।।7।।
सुमन सानिध्य में धन्य हुए । सेवारत सकल अरण्य हुए ।।8।।
उद्यान लगता ज्यों गगन हो । पुष्प नहीं, तारों का वन हो ।।9।।
भाग्य बनेंगे इसी बहाने । प्रभु, तेरी लीला तू ही जाने ।।10।।

6

श्यामवर्ण पीताम्बरधारी । आये राम अमंगलहारी ।।1।।
चौदह वर्ष प्रभु मुनिवेष में । रहे अज्ञात वन-प्रदेश में ।।2।।
ख्याल विवाहोत्सव का आया । मन को वह जयमाल लुभाया ।।3।।
स्मरण कर के वही सुंदर मुख । हुए श्रृंगार हेतु उन्मुख ।।4।।
परमशक्ति सीता-पूजन को । चुनेंगे राम स्वयं सुमन को ।।5।।
यही सोचकर प्रभु मुस्काये । वन को पल में धाम बनाये ।।6।।
रामदर्शन को अधीर हुए । श्रीकमलरज ले समीर बहे ।।7।।
चंदन-सुरभि-सुवासित मानो । उत्साहित कण-कण सब जानो ।।8।।
गिरि से झर-झर-झरते-झरने । लगे ताप धरती के हरने ।।9।।
कहती नद की कलकल-धारा । श्रीरामचरण ही ठौर हमारा ।।10।।

7

करकमलों का अति सुख पाकर । कहा पुष्पों ने स्वर मिलाकर ।।1।।
प्रभु के दुर्लभ दर्शन पाये । कृपा से नर-योनि में आये ।।2।।
हम जंगल में खिलनेवाले । सभी धूल में मिलनेवाले ।।3।।
क्या जाने दुःख-दर्द पराया । धन्य अवनि पर मानव काया ।।4।।
पत्थर हुआ स्पर्श से नारी । मुक्त हुई गौतम की प्यारी ।।5।।
हम इस नर-जीवन को पाकर । रखें कब-तक स्वभाव छिपाकर ।।6।।
फूलों का संसार अनोखा । व्यक्त गंध में उदगार होता ।।7।।
संघर्ष है मानव जीवन में । अहम् खड़ा लड़ने को मन में ।।8।।
हम कोमल अति मन-काया से । दूर रखो नर की छाया से ।।9।।
लौटा दो वह रूप दुबारा । स्वीकार करो प्रणाम हमारा ।।10।।

8

सुनकर नम्र निवेदन सुमन के । ठहरे चाल मनोहर चल के ।।1।।
मुस्काये कुछ राम सोच के । स्वीकृत हुए प्रणाम पुष्प के ।।2।।
कहो, “आखिर क्यों भय मनुज से । जब कि अभय रहते हो वन में ।।3।।
इस जीवन को देव तरसते । जग में आकर लीला करते ।।4।।
इस अमोल अवसर को पाकर । हाँ, क्यों रहे हो उपेक्षा कर ।।5।।
त्याग दो सब शंका-निराशा । व्यक्त करो मन की अभिलाषा ।।6।।
जग में जैसे अतिमानव हैं । वैसे ही जड़मति-दानव हैं ।।7।।
इसी समर हेतु हम आये । कहकर राम स्वयं मुस्काये” ।।8।।
अभिज्ञान श्रीमुख से सुन के । सिहर उठे त्यों प्राण सुमन के ।।9।।
कहा फूलों ने, “वर दो हमें । पुष्पक-विमान बना लो हमें” ।।10।।

9

हे पुरातन अनंत विभाकर । कहा पुष्प ने शीश नवाकर ।।1।।
“प्रभु, फूलों की नियति फूल है । जीना कष्टकर प्रतिकूल है ।।2।।
तुम जो चाहो कर सकते हो । पर साधारण-नर लगते हो ।।3।।
इस जीवन से पुनः त्राण हो । पुष्प में रूपान्तरित प्राण हो ।।4।।
रख लो चुन-चुनकर डलिया में । पात्रता अनुकूल बगिया से ।।5।।
सुंदर कर से भूषण वर दो । कर से अपने मुक्त कर दो ।।6।।
अर्थ प्रदान करो निज कर से । सजाकर जानकी के उर से ।।7।।
यदि सिया की माया न होती । पुष्प पर रामकृपा न होती” ।।8।।
राम हुए अतिभावुक सुन के । बोलो, “इस जीवन को तज के ।।9।।
धारण करो वही रूप सुकुमार । स्वधर्म ही है मुक्ति का द्वार” ।।10।।

10

डेग-डेग कमलचरण धर-धर । चुनते श्रीराम सुमन निज कर ।।1।।
देख पुष्प को बिखरे वन में । सोच रहे हैं मन-ही-मन में ।।2।।
सुंदर भूषण बना-बना के । प्राणप्रिया को स्वयं सजा के ।।3।।
देवी को अति प्रसन्न करूँगा । पुष्पमाला अर्पण करूँगा ।।4।।
आद्दशक्ति की पूजा होगी । वन में रस की वर्षा होगी ।।5।।
देख मौन भगवतीसिया को । निकट गये रिझाने प्रिया को ।।6।।
धनु-वाण रख दिये उतार कर । फूलों का, दिये उद्धार कर ।।7।।
प्रभु ने आदर्श-श्रृंखला में । दिखलाया कनुरूप लिलया में ।।8।।
सुमन गूँथकर राम बनाये। अलंकार सादर पहनाये ।।9।।
छवि लगती है ऐसी सुंदर । नगपति पर ज्यों गौरी शंकर ।।10।।

11

सब जड़-जगत वनस्पतिधारी । हुए राम के आज्ञाकारी ।।1।।
बरसे वन में ऐसे बादल । भरा बूँद मोती से आँचल ।।2।।
मधुप छिपा जैसे फूलों में । छिपा चाँद का मुख मेघों में ।।3।।
चतुर्दिक अति आनंद छाया । विवाद तारों में गहराया ।।4।।
अवस्था प्रकृति की, भंग हुई । सर्जन-लीला आरम्भ हुई ।।5।।
थिरकती है शक्ति कण-कण में । चलती प्रभु की लीला वन में ।।6।।
सीमित मानव-बुद्धि से परे । क्रीड़ा नानाविध राम करे ।।7।।
जगत में अनेक रूप प्रभु के । निकट अतिमानव स्वयंभू के ।।8।।
लगती शीत में अग्नि प्यारी । गर्मी में जल-धारा न्यारी ।।9।।
लगे जगत शर्मन को सारा । अद्वैत लहर का ही मारा ।।10।।

12

रामनाम लिखा यदि जाये । सिंधु पत्थर डुबो न पाये ।।1।।
अहम् अगर ऐसे गिर जाये । निश्चय प्राण परमगति पाये ।।2।।
वन में देख राम की लीला । लाल हुआ जो नभ था नीला ।।3।।
मानवरूपी कंकण आया । भेष बदलकर दानव आया ।।4।।
न जाने किस निलय में जाकर । रखा था निज को छिपाकर ।।5।।
शांत-सर में गिरा ज्यों रावण । टूट गया दर्पण त्यों पावन ।।6।।
बिखरी ललित छवि स्वयंवर की । माला टूट गिरी हो उर की ।।7।।
शांत सरोवर सहित सकल वन । हुए ऋषिवर सब विकल तत्क्षण ।।8।।
धनुष राम अविलम्ब उठाये । लक्ष्य भेदकर वाण चलाये ।।9।।
अभिमंत्रित हो चला ब्रह्मशर । आरम्भ हुआ – “श्रीरामसमर” ।।10।।

 

Leave a Reply