मैं ये नहीं कहता कि शहर नहीं आना

मैं ये नहीं कहता कि शहर नहीं आना
किसी के बहकावे में इधर नहीं आना

मानाकि शहर में शोहरत मिलेगी मगर
गाँव से रिश्ता तोड़कर नहीं आना

शहर खुशहाल है, गाँव की बदौलत
खेत-खलिहान छोड़कर नहीं आना

यहाँ बेबस, बेघर लोग भी रहते हैं
रंगीन बत्तियाँ देखकर नहीं आना

तुम नहीं आना, हर्गिज़ नहीं आना
है मासूम चेहरा अगर नहीं आना

यहाँ भागते हैं लोग मृग के पीछे
लक्ष्मण-रेखा खींचकर नहीं आना

यहाँ किसी को किसी की परवाह नहीं
रह जायेगा अधूरा सफ़र नहीं आना

यूँ तो गाँव भी महफूज़ नहीं है, मगर
परिंदों की मानिंद उड़कर नहीं आना

ये मेरा शहर, तुम्हारा गाँव नहीं है
आम का बागीचा समझकर नहीं आना

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