घाटियों से ध्वनि आ रही

अंतरतम की तान सुनो
जो गूँज रही आवाज सुनो
अतिथि की पदचाप सुनो
नीत आहट उसकी आ रही
घाटियों से ध्वनि आ रही

प्रतिपल आ रहा निमंत्रण
बुद्धं शरणम्-बुद्धं शरणम्
चलने को उद्धत हुए चरण
साथी, घड़ी विदा की आ रही
घाटियों से ध्वनि आ रही

विरह उसी से, मिलन उसी से
एक तत्त्व दो रूप उसी के
देखूँ उसकी छवि सभी में
तरि चैतन्य की, आ रही
घाटियों से ध्वनि आ रही

Leave a Reply