पनाहे दे रहें हैं सब , रिहाई हमने मांगी हैं

पनाहे दे रहें हैं सब , रिहाई हमने मांगी हैं

गुनाह-ए-इश्क में सोकर ये आँखें रात जागी हैं

जो तर्क-ए-इश्क करना है थोड़ी तोहमत लगा देना

मेरे सजदों में बस तुम हो तुम्हारे दिल में बागी है

-संजीव आर्या

 

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