बूँद-बूँद प्यास बुझाऊँगी

सागर की लहरें लहरा कर
कूल-किनारा को सिहरा कर
चली गयी तृष्णा जगा कर
कहकर कि मैं फिर आऊँगी
बूँद-बूँद प्यास बुझाऊँगी

तरंग गयी तो फिर न आयी
अंतर से इक आवाज़ आयी
सुनकर उसकी याद आयी
मन के तारों में गाऊँगी
बूँद-बूँद प्यास बुझाऊँगी

एक बूँद नैनों से ढरककर
गिर मिली सागर में तड़पकर
विरही-जलभँवरा बनकर
सागर-वक्ष पर मड़राऊँगी
बूँद-बूँद प्यास बुझाऊँगी

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