संध्या ढली और रात हुई

अस्ताचल की लाली ढल गयी
सूरज के संग किरणें चल गयीं
व्यवस्था दिन की बदल गयी
हर पल की बातें याद हुई
संध्या ढली और रात हुई

कहती थी, “प्यास बुझाऊँगी
अधरों से अमृत बरसाऊँगी
मैं प्यार के दीप जलाऊँगी”
पर, न जाने क्या बात हुई
संध्या ढली और रात हुई

बिखर गये जीवन के सपने
सुमन मुरझा गये उपवन के
भींग गयीं आँसू से पलकें
शेष शबनम सारी रात हुई
संध्या ढली और रात हुई

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