पहचान मेरी खो गयी है

सांध्य-तारा टिमटिमा रहा है
चाँद भी मुस्कुरा रहा है
नभ से कोई आ-जा रहा है
छाया उसकी हो रही है
पहचान मेरी खो गयी है

तिमिर धीरे-धीरे आया
मन में मेरे आ समाया
विस्मृत हुई अपनी ही काया
निस्तब्ध रात्रि हो रही है
पहचान मेरी खो गयी है

लाऊँ कहाँ से मैं ढूंढ़ कर
जाने गयी कहाँ प्रभा रूठ कर
बिखर गया हूँ टूट-टूट कर
सुनयना मेरी रो रही है
पहचान मेरी खो गयी है

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