सजनि ! सावन की रात घनेरी

हम एक-दूजे से मिलकर
उभय प्यार करें जी भरकर
बाहों के घेरे में घिरकर
मिलन-तरि अज्ञात बहे री
सजनि ! सावन की रात घनेरी

व्यर्थ सुख-दुःख की बात कर
दर्द की तू बरसात न कर
अतृप्त जग से प्रस्थान न कर
मैं चातक, तू स्वाति-बूंद मेरी
सजनि ! सावन की रात घनेरी

मेघांचल की ओट में छिपकर
चाँद खेल रहा लुक-छिपकर
चाँदनी आँगन में सिमटकर
साजन से उर-अरमान कहे री
सजनि ! सावन की रात घनेरी

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