प्रिये ! युग-संधि की बेला है

पर्वत से झरनों का गिरना
सागर में नदियों का मिलना
लहरों से लहरों का मिलना
यह मिलन सनातन अलबेला है
प्रिये ! युग-संधि की बेला है

चोंच से चोंच विहग के मिलते
हम-तुम जैसे दो युग मिलते
हृदय-सुमन आलिंगन में खिलते
यह संगम तीर्थाटन-मेला है
प्रिये ! युग-संधि की बेला है

मिलने को तत्पर दो कुल है
वियोगी का हृदय व्याकुल है
कली को खिलकर बनना फूल है
पर, कारा में मधुप अकेला है
प्रिये ! युग-संधि की बेला है

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  1. Nanda Kiran 07/07/2012

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