ओ संगिनी! संग चलो मेरे

जैसे सागर में लहरें उठतीं
जैसे जीवन में सांसें चलतीं
जैसे सुगंध हवा ले उड़तीं
तुम वैसे ही संग बहो मेरे
ओ संगिनी! संग चलो मेरे

अभी-अभी संध्या ढली है
गुपचुप तारों में बात चली है
पीर जगाती हवा चली है
आ, ऐसे में अंग लगो मेरे
ओ संगिनी! संग चलो मेरे

तू मन-मंदिर की मूरत है
अनुपम ध्यान की सूरत है
तेरे आगे मस्तक नत है
उर अपने रंग रंगों मेरे
ओ संगिनी! संग चलो मेरे

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