साथी, कोई न देगा साथ

तम भी अपना दम तोड़ेगा
ग़म भी तेरा संग छोड़ेगा
फिर किससे नाता जोड़ेगा
यहाँ आकर जायेगा प्रात
साथी, कोई न देगा साथ

हर रिश्ते का अंतिम-द्वार
खुलता है जब कभी इसपार
देता है दुःख ही अपार
बदल-बदलकर अपना स्वाद
साथी, कोई न देगा साथ

कभी हँसाकर, कभी रुलाकर
कभी अपने में उलझाकर
रखेगा तुझको बहलाकर
कहकर, “मैं हूँ तेरे साथ”
साथी, कोई न देगा साथ

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