पूर्वाभास

एकबारगी…सारे-के-सारे कबूतर उड़ गये
शायद, उन्हें परिवेश में होनेवाली दुर्घटना का
पूर्वाभास हो गया हो !

सब-के-सब एक वृत्त में…
घूमते जा रहे हैं मुंडेर के आस-पास
चूँकि घर से एक कुबड़ा निकलता है…रोज
अपनी हथेली पर कुछ दाने लेकर
और अपनी आँखें आकाश की ओर उठाकर,
हाथ फैलाकर पुकारता है…
आओ, चुग लो…ओ कबूतरो !
मेरी हथेली पर पड़े हुए सभी दाने तुम्हारे ही हैं…
आओ, चुग लो…ओ कबूतरो !
मगर उड़े ही जा रहे हैं कबूतर…आखिर कब तक
शायद, जब तक वे थककर चूर-चूर नहीं हो जाते ।

हाँ, भूख लगेगी तो दाना चुगना ही होगा
और दाना चुगने के लिए एक-न-एकबार
तो जमीन पर उतरना ही होगा
(हम परिवेश से कटकर नहीं रह सकते)
यहीं जीना है, मरना है ।
सबों को एक-एककर के उतरना होगा…
अपनी जमीन पर ।
और हररोज की तरह
हथेली पर रखे हुए दाने, कुबड़े के कंधे पर…बांह पर
और उसके सिर पर बैठकर…चुगना ही होगा ।
कुबड़ा दाना खिलायेगा…कुछेक अपने इर्द-गिर्द बिखेरेगा
हाँ, सबों को बारी-बारी से उतारेगा
उसकी हथेली पर का दाना…

पुनश्चः

लेकिन, कबूतरों के उतरते ही
कुबड़ा जमीन पर लुढ़क गया…दाने बिखर गये
एकबारगी…सारे-के-सारे कबूतर उड़ गये
शायद, उन्हें परिवेश में होनेवाली दुर्घटना का…
पूर्वाभास हो गया हो ।
नोट : “उत्तरपूर्वा” से साभार

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