मैं कवितायें लिखूँगा

अपने भाई के बहते हुए खून की,
मैं कवितायें लिखूँगा…आतंक की, ऊब की,
क्योंकि अब आकाश में पंछी नहीं,
लाशें उडेंगी बिना डैनों की,
और अपनी प्यास बुझाने के लिये
21 वीं सदी में दौड़ेंगी प्रेत की शक्ल में
सड़कों पर…गलियारों में
मैं कवितायें लिखूँगा…रेस्तरां, क्लबों और
चौराहे पर मडराती हुई छायाओं की,
क्योंकि अब आकाश में पंछी नहीं,
लाशें उडेंगी बिना डैनों की ।

आँगन से मातम की आवाज आयेगी
फूलों से सुगंध की जगह सडांध आयेगी
मैं कवितायें लिखूँगा…जुल्म के साये में दम तोड़ते हुए
बच्चों की किलकारियों की, ढहते दर-ओ-दीवारों की,
क्योंकि अब आकाश में पंछी नहीं,
लाशें उडेंगी बिना डैनों की ।

सर-ए-आम औरतों पर दरिंदों की नज़र उठेगी,
समंदर की कोख से आग की लहर उठेगी
मैं कवितायें लिखूँगा…बेगुनाहों के खून से
सने हुए हाथों की, शहरों की, गाँवों की,
अपने भाई के बहते हुए खून की,
मैं कवितायें लिखूँगा…आतंक की, ऊब की ।

यही सोचकर अक्सर मैं सोचता हूँ…
नई पौध का न जाने क्या हश्र होगा
नापाक-इरादों और बारूदों के खिलौनों का क्या असर होगा ?
क्या मैं कवितायें लिखूँगा…विनाश की ?
शायद, मैं कवितायें लिखूँगा…सृजन की,
शान्ति के दूत की, नई उमंग और उत्साह की,
प्यार की देवी और देवताओं की…हाँ,
मैं कवितायें लिखूँगा…विश्व-बंधुत्व की,
अखण्ड-उत्सव की ।
नोट : “उत्तरपूर्वा” से साभार

Leave a Reply