शर्मन की कविताओं का नैरन्तर्य

गर्भ में…
मैंने एक कविता सुनी थी
जो मेरी माँ के लिए
मेरे पिता ने रची थी…याद है,
“सौर्यमंडल का डान”
पृथ्वी की गहराई से निकलकर
पहाड़ों पर चढ़ रहा है
किरणों के अक्षत छिड़कते हुए
अब सारी आशायें पूरी होंगी…
शायद, वे मुझे सुनाना चाहते थे…माँ के मार्फत
मैं तुम्हें चाहता हूँ…अपने पिता की तरह
बचपन के दिन…याद है,
माँ लोरी गुनगुनाया करती थी…
उसी धुन पर…
मैंने रची हैं कवितायें
सिर्फ तुम्हारे लिये
जैसेकि मेरे पिता ने रची थी माँ के लिए
आज उसके फल देने का समय आ गया है
मैं तुम्हारे गर्भ में…
कविता का सूक्ष्म-जीवाणु छोड़ जाऊँगा
ताकि तुम गाती रहो…गुनगुनाती रहो…
मेरी माँ की तरह
और कविता का नैरन्तर्य
सदा बना रहे…
नोट : “उत्तरपूर्वा” से साभार

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