शेष जो है वही सच है

1

चिट्ठी
बिन पते की,
जो मिली…उसे पढूँ कि न पढूँ
सोचता रहा…
वर्षों बाद ख्याल आया
जरा पढूँ तो क्या है…सन्देश
मालूम हुआ
कोई भेजा है मेरे नाम
अपना प्यार ।
शायद, इसी तरह
हम ढूंढते हैं ज़िन्दगी में…कुछ
ज़िन्दगी भर ।
लिफाफा खोलने,
न खोलने के अंतर्द्वंद में
गुज़र जाती है ज़िन्दगी
और हम
रह जाते हैं वंचित प्रायः
किसी-न-किसी के
अनमोल प्यार से ।

2

खतों को…
पढ़-पढ़कर आधी से अधिक
ज़िन्दगी गुज़ार दी ।
एक गौरैया की तरह
चोंच मारता रहा आईने में ।
उनको देखा
तो ऐसा लगा
कि ज़िन्दगी
खतों से आगे…बहुत आगे…
निकल चुकी है ।
शेष
जो है…वही
सच है ।
नोट : “उत्तरपूर्वा” से साभार

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