गुलाब और कैकट्स

 

एक प्यास दम तोड़ रही है
और भूख…अंतड़ियों को नोंच रही है
कहीं कोई आत्मा नहीं है
इस हाड़-मांस के लुथडे में…वर्ना
उसकी आँखें जरूर कुछ-न-कुछ बोलतीं
जरूर उसके हाथ मचलते मशाल के लिये
जरूर उसके कान खड़े हो जाते
उसकी पुकार सुनने के लिये
जो आवाज़ दे-देकर गूँगा हो गया है
ज़ख्म जो ऊपर-ही-ऊपर सूख चुका था…फिर
भीतर-ही-भीतर हरा हो गया है
अब…वह नाचता है छटपटाने की तरह
अब…वह हँसता है पागलों की तरह
अपने से ही अपना इलाज करता हुआ
दिन-पर-दिन लाइलाज मरता हुआ
फिर भी, जब कभी वह खांसता है तो अपने साथ
इन्कलाब लाता है यह कहता हुआ कि
जब से मेरी मोहब्बत कब्र हो गयी है
मैं गुलाब की जगह…कैकट्स हो गया हूँ
अब…लोगों की आँखों में चुभता हूँ
क्योंकि मैं फूलों का बाग़ नहीं
काँटों का बागीचा हो गया हूँ
किसने मेरी टहनियों को काटकर
फौलादी जमीन पर बो दिया है ?
वैसे मैं नश्ल हूँ गुलाब की,
लेकिन शहर की हवाओं ने
मुझको कैकट्स बना दिया है
अब…मैं चुभता हूँ जिसके भी जिस्म से
वह आह ! करता हुआ दूर भागता है…लेकिन
मैं अपनी भाषा में कहता हूँ…
“तुम सोया न करो…जागो !
अपने भीतर के गुलाब के प्रति
वर्ना, तेरी मोहब्बत भी
एक दिन कब्र हो जायेगी ।”

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